डिजिटल दुनिया का पेट्रोल क्यों कहलाता है सेमीकंडक्टर? इसमें भारत कितना मजबूत, जानिए पूरी ABCD

स्मार्टफोन से मिसाइल तक सब सेमीकंडक्टर पर निर्भर। भारत की 76,000 करोड़ की योजना शुरू, पर क्या हम TSMC जैसी कंपनियों को टक्कर देंगे?

Rohit Agrawal
Published on: 16 May 2025 12:47 PM IST
डिजिटल दुनिया का पेट्रोल क्यों कहलाता है सेमीकंडक्टर? इसमें भारत कितना मजबूत, जानिए पूरी ABCD
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एक छोटी सी चिप के बिना आज की दुनिया अधूरी है। चाहे आपका स्मार्टफोन हो, लैपटॉप हो, कार हो या फिर हवाई जहाज—सब कुछ सेमीकंडक्टर की वजह से ही चलता है। यह छोटी सी चिप आधुनिक तकनीक की धड़कन है, जिसके बिना डिजिटल दुनिया का कोई भी उपकरण काम नहीं कर सकता। 2021 में सैमसंग ने चेतावनी दी थी कि सेमीकंडक्टर की कमी से वैश्विक अर्थव्यवस्था ठप हो सकती है। यह बात सच साबित हुई जब 2022 में मारुति सुजुकी को 1.5 लाख कारों का प्रोडक्शन रोकना पड़ा। आज, जब दुनिया तेजी से डिजिटल हो रही है, सेमीकंडक्टर की मांग और भी बढ़ गई है। भारत भी अब इस दौड़ में कूद चुका है। मोदी सरकार ने हाल ही में नोएडा में छठी सेमीकंडक्टर यूनिट को मंजूरी दी है, जो हर महीने 3.6 करोड़ चिप्स बनाएगी। लेकिन सवाल यह है कि क्या भारत वैश्विक सेमीकंडक्टर मार्केट में अपनी पकड़ बना पाएगा?

क्यों है सेमीकंडक्टर की दुनियां भर में मांग?

सेमीकंडक्टर को 'डिजिटल युग का पेट्रोल' कहा जाता है। जिस तरह 20वीं सदी में तेल ने दुनिया की अर्थव्यवस्था को संचालित किया, उसी तरह 21वीं सदी में सेमीकंडक्टर यही भूमिका निभा रहा है। यह चिप सिर्फ इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों तक सीमित नहीं है बल्कि यह AI, 5G, इलेक्ट्रिक वाहनों, सैटेलाइट्स और यहां तक कि मिसाइलों में भी इस्तेमाल होती है। कोविड के दौरान जब सेमीकंडक्टर की सप्लाई चेन टूटी, तो पूरी दुनिया में हड़कंप मच गया था। कंपनियों को अरबों डॉलर का नुकसान हुआ, और इस संकट की तुलना 1970 के तेल संकट से की जाने लगी। आज, जब तकनीक तेजी से आगे बढ़ रही है, सेमीकंडक्टर की मांग और भी बढ़ गई है।

सेमीकंडक्टर योजना में भारत कितना मजबूत?

बता दें कि भारत ने 'सेमीकॉन इंडिया प्रोग्राम' के तहत 76,000 करोड़ रुपये (10 अरब डॉलर) का निवेश किया है। अब तक देश में 6 सेमीकंडक्टर यूनिट्स को मंजूरी मिल चुकी है। गुजरात के साणंद में टाटा और माइक्रोन की 22,516 करोड़ रुपये की यूनिट बन रही है, जो 20,000 नौकरियां पैदा करेगी। धोलेरा में टाटा और ताइवान की PSMC की 91,000 करोड़ रुपये की यूनिट हर महीने 50,000 वेफर्स बनाएगी। असम के मोरीगांव में टाटा की 27,000 करोड़ रुपये की यूनिट रोज 4.8 करोड़ चिप्स बनाएगी। इसके अलावा, HCL और Foxconn की नोएडा में 3,700 करोड़ रुपये की यूनिट हर महीने 3.6 करोड़ चिप्स का उत्पादन करेगी। ये यूनिट्स भारत को सेमीकंडक्टर के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में बड़ा कदम हैं।

भारत के लिए क्या हैं चुनौतियां और संभावनाएं?

भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती आयात पर निर्भरता है। 2023-24 में भारत ने 1.71 लाख करोड़ रुपये की सेमीकंडक्टर चिप्स आयात कीं, जो पिछले साल से 18.5% ज्यादा है। वैश्विक स्तर पर चीन 150 अरब डॉलर और अमेरिका 50 अरब डॉलर खर्च कर रहा है, जबकि भारत का बजट सीमित है। ताइवान की TSMC दुनिया की 50% चिप्स बनाती है, और भारत अभी इस मामले में पीछे है। हालांकि, UBS की रिपोर्ट के मुताबिक, 2030 तक भारत का सेमीकंडक्टर मार्केट 108 अरब डॉलर (9.3 लाख करोड़ रुपये) तक पहुंच सकता है। भारत के पास एक बड़ा फायदा यह है कि दुनिया के 20% चिप डिजाइनर यहां काम करते हैं, जिसमें इंटेल और क्वालकॉम जैसी कंपनियां शामिल हैं।

क्या भारत सेमीकंडक्टर सुपरपावर बन पाएगा?

भारत की सेमीकंडक्टर यात्रा अभी शुरुआती दौर में है, लेकिन संभावनाएं उज्ज्वल हैं। अगर सरकार और प्राइवेट सेक्टर मिलकर इंफ्रास्ट्रक्चर और सप्लाई चेन को मजबूत करें, तो भारत अगले 5-10 साल में सेमीकंडक्टर उत्पादन में अहम भूमिका निभा सकता है। फिलहाल, चुनौतियां बड़ी हैं, लेकिन अगर सही रणनीति के साथ आगे बढ़ा जाए, तो भारत डिजिटल युग के 'नए तेल' पर अपनी निर्भरता कम कर सकता है और वैश्विक मानचित्र पर अपनी पहचान बना सकता है।
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