दिल्ली के स्कूलों में गुरु गोबिंद सिंह के साहिबजादों की शहादत के मंचन पर लगी रोक
Guru Gobind Singh Sahibzaade: दिल्ली के स्कूलों में गुरु गोबिंद सिंह के साहिबजादों की शहादत को मंच पर दिखाने पर रोक लगा दी गई है। इस संबंध में शिक्षा निदेशालय ने सभी स्कूलों जिनमे सरकारी और निजी दोनों शामिल है, के प्रमुखों को पत्र लिख शाहदत (Guru Gobind Singh Sahibzaade) के मंचन पर रोक लगा दी है।
यह निर्णय निदेशालय को राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग से प्राप्त एक पत्र के बाद लिया गया है। इसके बाद गुरु गोबिंद सिंह के साहिबजादों (Guru Gobind Singh Sahibzaade) और उनके परिवार के सदस्यों पर आधारित नाटक मंचन को लेकर स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर जारी की गई है।
क्या लिखा आयोग ने अपने पत्र में?
राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग ने अपने पत्र में स्पष्ट लिखा है कि कोई भी व्यक्ति या संगठन साहिबजादों और उनके परिवार के सदस्यों के ऐतिहासिक व्यक्तित्व को नाटकों, ड्रामा या प्रदर्शनों में गलत तरीके से प्रस्तुत न करे। पत्र के अनुसार सिख गुरुओं एवं उनके परिवार के सदस्यों की भूमिका निभाना प्रतिबंधित है। इसे अपमानजनक माना जाता है।
पत्र के अनुसार, कोई भी व्यक्ति स्वयं को किसी भी सिख गुरु या उनके परिवार के सदस्य के रूप में अभिनय व प्रदर्शन नहीं कर सकता है। साहिबजादों और उनके परिवार के सदस्यों को किसी भी मंचीय नाटक या ड्रामा में व्यक्तियों द्वारा चित्रित नहीं किया जाना चाहिए। बच्चों को साहिबजादों की तरह कपड़े पहनने या उनकी नकल करने की अनुमति नहीं है। यह सिख सिद्धांतों और प्रथाओं के खिलाफ है।
पत्र में लिखा गया है कि सिख गुरुओं और उनके परिवार के सदस्यों के प्रति श्रद्धा केवल लिखित या मौखिक रूप में ही बताई जा सकती है। सिख गुरुओं और उनके परिवार के सदस्यों का इतिहास एनिमेशन के माध्यम से दिखाया जा सकता है। ऐतिहासिक शख्सियत खासकर गुरु गोबिंद सिंह के साहिबजादों का चित्रण बहुत ही सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व का मुद्दा है।
कौन थे गुरु गोबिंद सिंह के साहिबजादे?
सिखों के दसवें सिख गुरु, गुरु गोबिंद सिंह जी ने सिख धर्म के लिए अपने चार बेटों, जिन्हें साहिबजादे के रूप में जाना जाता है, का बलिदान दिया। उनके बड़े बेटे, साहिबजादा अजीत सिंह और साहिबजादा जुझार सिंह ने मुगल सेना के खिलाफ बहादुरी से लड़ते हुए 1704 में चमकौर की लड़ाई में शहादत प्राप्त की। उनके छोटे बेटों, साहिबजादा जोरावर सिंह और साहिबजादा फतेह सिंह को पकड़ लिया गया और इस्लाम धर्म अपनाने से इनकार करने पर मुगलों ने उन्हें बेरहमी से जिंदा जला दिया। उनका बलिदान सिख धर्म के प्रति अटूट साहस, आस्था और भक्ति का प्रतीक है। साहिबजादों की शहादत को हर साल उनकी बहादुरी और धार्मिकता के प्रति प्रतिबद्धता की याद के रूप में मनाया जाता है।
साहिबजादों की याद में मनाया जाता है वीर बाल दिवस
2022 में, केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने चार साहिबजादों के बलिदान की याद में 26 दिसंबर को "वीर बाल दिवस" के रूप में घोषित किया। चार साहिबजादों की विरासत सिखों और अन्य धर्मों के लोगों को साहस, विश्वास और आत्म-बलिदान के अपने मूल्यों को बनाए रखने के लिए प्रेरित करती है। उनकी कहानी अक्सर सिख समुदायों में सुनाई जाती है ताकि विपरीत परिस्थितियों में भी सही के लिए खड़े होने का महत्व सिखाया जा सके।
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