वक्फ बिल पर टकराव तय? 11 ऐतिहासिक फैसले जो बताते हैं अदालतें कैसे पलट देती हैं बाजी!
Amendment Bill Legal Challenge: वक्फ संशोधन बिल पर बवाल थमने का नाम नहीं ले रहा। बिल में किए गए संशोधनों के खिलाफ अब मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच चुका है। कांग्रेस सांसद जावेद और एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने शुक्रवार को वक्फ संशोधन विधेयक की वैधता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।
उनका तर्क है कि यह बिल संवैधानिक प्रावधानों के खिलाफ है और असंवैधानिक घोषित किया जाए। अब सवाल उठता है कि क्या वाकई में वक्फ बिल में हुए संशोधनों को न्यायिक स्तर पर पलटा जा सकता है? (Waqf Amendment Bill Legal Challenge) भारत में इससे पहले भी कई अहम विधेयकों और कानूनों को सुप्रीम कोर्ट मै चुनौती दी गई है। ए.के.गोपालन बनाम मद्रास राज्य से लेकर नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) तक...कई बार संसद की ओर से बनाए गए कानूनों की संवैधानिकता पर अदालतों ने फैसला सुनाया है।
इस पृष्ठभूमि में यह जानना बेहद जरूरी हो जाता है कि क्या वक्फ बिल पर कोर्ट वैसा ही ऐतिहासिक फैसला सुना सकता है, जैसा पहले हो चुका है ?
ए. के. गोपालन बनाम मद्रास राज्य (1950):
नजरबंदी और मौलिक अधिकारों की व्याख्या से संबंधित शुरुआती मामला। ये संविधान लागू होने के बाद दर्ज मामले में एक ऐतिहासिक फैसला था। इस मामले में प्रिवेंटिव डिटेंशन लॉ को दी गई चुनौती सें संबंधित था, जिसके तहत याचिकाकर्ता को दोषी ठहराया गया था। चुनौती का मुख्य आधार यह था कि कैद ने अनुच्छेद 19 (1) (डी) के तहत प्रदत्त याचिकाकर्ता के मौलिक अधिकार। भारत के किसी भी हिस्से में स्वतंत्र रूप आने जाने का अधिकार, का हनन किया था।
केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973)
एक ऐतिहासिक निर्णय जिसने 'मूल संरचना' सिद्धांत की स्थापना की, संविधान में संशोधन करने की संसद की शक्ति को सीमित किया। ऐतिहासिक केस में 24 अप्रैल 1973 को दिए गए इस फैसले में 7:6 के बहुमत से न्यायालय ने कहा कि संसद संविधान में संशोधन कर सकती है, लेकिन उसकी 'मूल संरचना' को नहीं बदल सकती।
इंदिरा नेहरू गांधी बनाम राजनारायण (1975)
सर्वोच्च न्यायालय ने 39वें संशोधन के एक प्रावधान को रद्द करने के लिए मूल संरचना सिद्धांत को लागू किया। इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा निर्णीत इस केस में भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को चुनावी कदाचार का दोषी पाया गया था। कोर्ट ने उनके चुनाव लड़ने पर 6 साल के लिए प्रतिबंध लगा दिया गया था। इसके बाद इंदिरा गांधी ने आपातकाल की घोषणा कर दी थी।
आईआर कोएलो बनाम तमिलनाडु राज्य (2007)
न्यायालय ने माना कि 24 अप्रैल, 1973 (केशवानंद भारती निर्णय की तिथि) के बाद नौवीं अनुसूची (जो शुरू में न्यायिक समीक्षा से प्रतिरक्षा की एक डिग्री प्रदान करती है) में रखा गया कोई भी कानून इस आधार पर चुनौती के लिए खुला है कि यह संविधान की मूल संरचना का उल्लंघन करता है।
नागरिकता (संशोधन) अधिनियम
संसद द्वारा पास किये गए 'नागरिकता संशोधन कानून' को लेकर भी सरकार के खिलाफ विपक्ष सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए नागरिकता (संशोधन) अधिनियम पर रोक लगाने से इंकार कर दिया था। अदालत ने 4-1 के फैसले से सिटिजनशिप एक्ट की धारा 6A की वैधता को भी बरकरार रखा था।
धारा-370 को हटाने का निर्णय
जम्मू-कश्मीर से धारा-370 हटाने का ऐतिहासिक कदम मोदी सरकार ने कानून में संशोधन कर उठाया था। इसके विरोध में भी विपक्षी, सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए थे। सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के केंद्र सरकार के फैसले को बरकरार रखा है।
मेनका गांधी बनाम भारत सरकार (1978):
अनुच्छेद 21 के तहत 'व्यक्तिगत स्वतंत्रता' के दायरे का विस्तार किया और 'न्यायसंगत, निष्पक्ष और उचित' प्रक्रिया की आवश्यकता पर जोर दिया।
गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य (1967)
न्यायालय ने माना कि संसद मौलिक अधिकारों में संशोधन नहीं कर सकती।
मिनर्वा मिल्स बनाम भारत सरकार (1980):
संविधान की सर्वोच्चता पर जोर देते हुए मूल संरचना सिद्धांत को और मजबूत किया। इस केस में सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्धारित किया कि अनुच्छेद 368 का खंड (4) विधिसम्मत नहीं (invalid) है क्योंकि यह न्यायिक पुनर्विलोकन को समाप्त करने के लिए पारित किया गया था।
शंकरी प्रसाद बनाम भारत संघ (1951):
न्यायालय ने माना कि संसद के पास मौलिक अधिकारों में संशोधन करने की शक्ति है। भारतीय संविधान का आर्टिकल 368 कहता है कि संसद को एक प्रक्रिया के तहत संविधान में संशोधन करने की शक्ति प्राप्त है।
इलेक्टोरल बॉन्ड को बताया असंवैधानिक
इलेक्टोरल बॉन्ड का मुद्दा ऐसा रहा, जहां केंद्र सरकार को सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद पीछे हटना पड़ा था। सुप्रीम कोर्ट ने इलेक्टोरल बॉन्ड के जरिए राजनीतिक चंदा जुटाने पर तुरंत प्रतिबंध लगा दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने इसे असंवैधानिक करार देते हुए कहा था कि इलेक्टोरल बॉन्ड को गुप्त रखना 'सूचना के अधिकार' और अनुच्छेद 19 (1) (ए) का उल्लंघन है।
लोकसभा-राज्यसभा में पारित हुआ विधेयक
वक्फ (संशोधन) विधेयक, 2025 पर राज्यसभा में 128 सदस्यों ने विधेयक के पक्ष में, जबकि 95 ने विरोध में मतदान किया, जिसके बाद इसे पारित कर दिया गया. लोकसभा ने तीन अप्रैल को विधेयक को मंजूरी दे दी थी. लोकसभा में 288 सदस्यों ने विधेयक का समर्थन, जबकि 232 ने विरोध किया था।
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