संघ की बदलती रणनीति! महिलाओं को आगे लाकर क्या RSS राजनीतिक समीकरण बदलने की तैयारी कर रहा है?
RSS Women Empowerment: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर (RSS) पर दशकों से यह आरोप लगाता रहा है कि यह केवल पुरुषों का संगठन है, जहां महिलाओं की भागीदारी ना के बराबर है। लेकिन अब लगता है कि संघ अपनी इस छवि को बदलने की दिशा में तेजी से कम कर रहा है। संघ की सहयोगी संस्थाओं में महिलाओं की मौजूद की पहले भी रही है, लेकिन मूल संगठन यानी RSS में महिलाओं की भागीदारी ना के बराबर रही है।
यहां तक की संघ के पूर्णकालिक प्रचारकों के लिए अविवाहित रहने की परंपरा भी चली आ रही है। लेकिन अब तस्वीर बदल रही है। हाल के वर्षों में संघ ने रानी दुर्गावती और अहिल्याबाई होल्कर जैसे वीरांगनाओं की जयंती को बड़े स्तर पर मनाना प्रारंभ कर दिया है। यह संघ के संस्कृत के झंडे और ( RSS Women Empowerment) हिंदुत्व विचारधारा मैं महिलाओं को अधिक प्रमुखता देने की सोची समझी रणनीती लगती है। इसके अलावा चुनाव दर चुनाव जिस तरह से महिलाओं का राजनीतिक महत्व बढ़ रहा है, उसे देखते हुए संघ की यह पहल महिला मतदाताओं को साधने की कोशिश भी मानी जा रही है क्या सच में सामाजिक बदलाव की पहल है या फिर राजनीति में हिंदुत्व के नए समीकरण की शुरुआत।
महिला वौट बैंक पर संघ की पैनी नजर
संघ का जोर वीरांगनाओं के सम्मान पर तो हमेशा सही रहा है, लेकिन क्या यह केवल संस्कृति एजेंडा है, या इसके पीछे महिला वोटरों की बढ़ती अहमियत भी एक बड़ा कारण है। बीते कुछ वर्षों में चुनावी राजनीति में महिला मतदाताओं की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो गई है। मध्य प्रदेश, हरियाणा ,महाराष्ट्र और दिल्ली जैसे राज्यों में सरकारों के गठन में महिलाओं से जुड़ी कल्याणकारी योजना की बड़ी भूमिका रही है । हाल ही में कई राज्यों में देखा गया है कि महिला मतदाता पुरुषों के मुकाबले अधिक संख्या में मतदान करने पहुंच रही है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या संघ यह पहल सच में महिलाओं के भागीदारी बढ़ावा देने की कोशिश है, या फिर एक सुनियोजित रणनीति है जो भविष्य के चुनावी समीकरणों को ध्यान में रखकर तैयार की गई है।
संघ कर रणनीति: वीरांगनाओं के सम्माम में हिंदुत्व को मजबूती
अगर संघ की रणनीति को गौर से देखा जाए, तो जिन वीरांगनाओं को खास तवज्जों दी जा रही है ,वे वही है जिन्होंने हिंदू धर्म और भारतीय संस्कृति की रक्षा के लिए विदेशी आक्रांताओं से संघर्ष किया था। इनमें अहिल्याबाई होल्कर, रानी दुर्गावती ,और रानी अकक्का जैसे नाम प्रमुख हैं। संघ इनकी जयंती विशेष रूप से मना रहा है, जिससे स्पष्ट होता है कि यह पहला केवल इतिहास को याद रखना तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका एक व्यापक उद्देश्य भी है।
संघ की विचारधारा के मुताबिक ये, सभी महिलाएं भारतीय मूल्यों और परंपराओं की प्रतीक थी। उनकी वीरता और संघर्ष की गाथा नई पीढ़ी तक पहुंचना आवश्यक है। संघ लोगों को यह बताने का समझाने का प्रयास कर रहा है कि कैसे रानी अबक्का ने पुर्तगालियों के खिलाफ 40 साल तक युद्ध लड़ा था, रानी दुर्गावती ने मुगलों के आक्रमण का बहादुरी से सामना किया था ,और रानी अहिल्याबाई होल्कर ने मंदिरों और धार्मिक स्थलों का जीर्णोद्धार की ऐतिहासिक पहल की थी। संघ की वरिष्ठ नेता दत्तात्रेय होसबले ने हाल ही में रानी अबक्का की 500 भी जयंती पर उन्हें कुशल प्रशासक और महान रणनीतिकार बताया। वहीं लोकसभा चुनाव से पहले रानी अहिल्याबाई होल्कर 300 जयंती मनाई गई थी। यह सभी प्रयास संघ की रणनीति का हिस्सा है, जो चुनावी समीकरण को प्रभावित करने के साथ-साथ हिंदुत्व के एजेंट को भी मजबूत करते हैं।
महिला मुद्दों पर घिरा संघ...क्या बदल रही है छवि ?
संघ पर लंबे समय से पुरुषों के संगठन होने का ठप्पा लगा हुआ है... और अक्सर उस पर महिलाओं को केवल बच्चे पैदा करने की सलाह देने के आरोप लगाते रहे हैं। पिछले साल दिसंबर में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने नागपुर में समाज बचाने के लिए महिलाओं को तीन बच्चे पैदा करने की सलाह दी जिस पर खूब विवाद हुआ था ।
कांग्रेस नेता राहुल गांधी भी संघ पर महिला विरोधी होने का आरोप लगाते हैं । यहां तक की उन्होंने भाजपा के प्रमुख नारे "जय श्रीराम" को भी महिला विरोधी बता दिया। राहुल गांधी संघ के खिलाफ मानहानि का मुकदमा भी झेल रहे, खासकर महात्मा गांधी की हत्या से जुड़े उनके बयान के कारण। उनका कहना है कि संघ और बीजेपी माता सीता का अपमान करती हैं वह हमेशा "जय सियाराम" बोलने की सलाह देते हैं।
भारत जोड़ो यात्रा के दौरान झालावाड़ में राहुल गांधी ने सवाल उठाया था सीता के बिना क्या राम हो सकते हैं? सवाल ही नहीं उठाता सीता के बिना राम नहीं हो सकते... राम के बिना सीता नहीं हो सकती... फिर भाजपा और संघ के लोग "जय सियाराम" क्यों नहीं बोलते? अब जब अगले बीजेपी अध्यक्ष के रूप में किसी महिला नेता का नाम सामने आ सकता है, तो यह संभावना बढ़ गई है कि संघ में भी महिलाओं की अधिक भागीदारी देखने को मिले। क्या यह संघ की छवि बदलने की कवायद है, या किसी बड़े राजनीतिक समीकरण की एडवांस रणनीति?
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