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बिहार में कांग्रेस का दलित दांव, क्या राहुल गांधी दिलाएंगे 40 साल पुराना रुतबा?

बिहार में सियासी हलचल तेज हो गई है। इस बार कांग्रेस पार्टी बिहार में वापस अपनी सरकार बनाने के लिए अपनी सियासी रणनीति में बड़ा बदलाव किया है। जानिए क्या बदलाव हुए हैं।
09:07 PM Mar 20, 2025 IST | Girijansh Gopalan

बिहार में चुनावी हलचल तेज हो गई है और कांग्रेस ने अपनी सियासी रणनीति में बड़ा बदलाव किया है। राहुल गांधी अब पूरी तरह से दलित वोट बैंक पर फोकस कर रहे हैं। इसी रणनीति के तहत कांग्रेस ने बिहार प्रदेश अध्यक्ष पद से भूमिहार समाज के अखिलेश प्रसाद सिंह की छुट्टी कर दलित समुदाय से आने वाले दो बार के विधायक राजेश कुमार को यह जिम्मेदारी सौंपी है। राजेश कुमार उर्फ राजेश राम औरंगाबाद के कुटुंबा सीट से विधायक हैं और कांग्रेस की दलित सियासत के नए चेहरा बन चुके हैं। राहुल गांधी का पूरा दांव बिहार में कांग्रेस के 40 साल पुराने दलित वोट बैंक को दोबारा हासिल करने पर है।

दलित वोटों की सियासत में कांग्रेस की नई चाल

बिहार में कांग्रेस के पास दलित सियासत की एक मजबूत विरासत रही है। जगजीवन राम, दिलकेश्वर राम जैसे नेता कांग्रेस के साथ रहे हैं और अब राहुल गांधी इसी विरासत को भुनाने की कोशिश में हैं। राजेश कुमार का कांग्रेस से पारिवारिक नाता है। उनके पिता दिलकेश्वर राम बिहार के कद्दावर दलित नेता थे और कांग्रेस सरकार में मंत्री भी रहे थे। इसी वजह से कांग्रेस ने अब राजेश कुमार को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर दलित समुदाय को स्पष्ट संदेश देने की कोशिश की है।

राजेश कुमार के सहारे कांग्रेस की नैया पार?

राजेश कुमार को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर कांग्रेस उन दलित वोटों पर पकड़ बनाने की कोशिश कर रही है, जिन पर फिलहाल जीतनराम मांझी और चिराग पासवान की पकड़ मजबूत है। राजेश कुमार खुद भी मानते हैं कि उनके लिए यह बड़ी चुनौती है, लेकिन उन्हें भरोसा है कि कांग्रेस की वापसी संभव है। बिहार में दलितों की आबादी करीब 18% है और राज्य में 38 सीटें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं। ऐसे में कांग्रेस को लगता है कि अगर वह इस समुदाय को फिर से अपने पक्ष में कर लेती है, तो बिहार की सियासत में दोबारा अपनी मजबूत पकड़ बना सकती है।

बिहार में दलित वोटों की बिसात

बिहार की राजनीति में दलित वोटरों की अहम भूमिका रही है। 90 के दशक में लालू यादव के उदय के साथ ही दलित वोट आरजेडी के पाले में चला गया, जबकि कुछ हिस्सा रामविलास पासवान और नीतीश कुमार के साथ जुड़ गया। बिहार में दलितों की 22 जातियां हैं, जिनमें रविदास, मुसहर और पासवान प्रमुख हैं। कांग्रेस अब इन्हीं जातियों को अपने पाले में लाने की रणनीति बना रही है। इसी के तहत राहुल गांधी ने हाल ही में बिहार में कई दलित नेताओं से मुलाकात की और संविधान बचाने के नाम पर दलित समुदाय को जोड़ने की कोशिश की।

कांग्रेस की दलित राजनीति का भविष्य?

कांग्रेस की नजर फिलहाल रविदास समुदाय के वोट बैंक पर है, जो बिहार में करीब 5.25% हैं। यही वजह है कि राहुल गांधी ने पासी समाज और रविदास समुदाय को साधने के लिए कई कार्यक्रमों में शिरकत की है। यूपी की तरह बिहार में दलित राजनीति उतनी मजबूत नहीं है, लेकिन कांग्रेस ने हमेशा दलितों के लिए बड़े फैसले लिए हैं। बिहार को पहला दलित मुख्यमंत्री भी कांग्रेस ने ही दिया था। भोला पासवान शास्त्री तीन बार बिहार के सीएम बने थे। ऐसे में कांग्रेस अपनी पुरानी विरासत को भुनाने की कोशिश कर रही है।

चिराग और मांझी को टक्कर देंगे राजेश राम?

एनडीए में इस समय दो बड़े दलित नेता हैं—चिराग पासवान और जीतनराम मांझी। चिराग का प्रभाव पासवान समाज पर है, जबकि मांझी का मुसहर समाज पर। कांग्रेस ने अब राजेश कुमार को आगे कर रविदास समाज को जोड़ने की कोशिश की है। इसके अलावा, कांग्रेस ने सुशील पासी को बिहार का सह-प्रभारी बनाकर पासी समाज के वोटों पर भी फोकस किया है। हाल ही में राहुल गांधी ने पासी समाज के नेता जगलाल चौधरी की जयंती पर कार्यक्रम में भाग लेकर इस समुदाय को साधने की कोशिश की थी।

क्या कांग्रेस की रणनीति सफल होगी?

बिहार की राजनीति में कांग्रेस की स्थिति फिलहाल कमजोर है। मंडल और कमंडल की राजनीति के बाद कांग्रेस का दलित और ओबीसी वोट बैंक बिखर गया। अब राहुल गांधी दोबारा से दलित और मुस्लिम वोट बैंक के सहारे अपनी खोई हुई जमीन वापस पाना चाहते हैं। अगर कांग्रेस अपने दलित वोट बैंक को दोबारा हासिल करने में कामयाब होती है, तो बिहार की राजनीति में बड़ा उलटफेर संभव है। अब देखने वाली बात यह होगी कि कांग्रेस की यह रणनीति कितना कारगर साबित होती है और क्या राहुल गांधी बिहार में कांग्रेस का पुराना रुतबा दोबारा ला पाएंगे?

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