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यासीन मलिक का सुप्रीम कोर्ट में दावा: "मैं नेता हूं, आतंकवादी नहीं"—क्यों दे रहा ऐसी दलीलें?

यासीन मलिक ने सुप्रीम कोर्ट में भौतिक पेशी मांगी, CBI ने उसे खतरनाक आतंकी बताया। कोर्ट ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से सुनवाई का आदेश दिया।
05:32 PM Apr 04, 2025 IST | Rohit Agrawal

Yasin Malik Supreme Court: जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (JKLF) के प्रमुख यासीन मलिक ने 3 अप्रैल 2025 को सुप्रीम कोर्ट में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेशी के दौरान कहा कि जज साहब, मैं नेता हूं, आतंकवादी नहीं, मुझसे 7 प्रधानमंत्रियों ने बात की है।" यह बयान उसने CBI की उस दलील के जवाब में दिया, जिसमें उसे "खतरनाक आतंकवादी" बताकर जम्मू कोर्ट में भौतिक पेशी से रोका गया। बता दें कि मलिक तिहाड़ जेल में आजीवन कारावास की सजा काट रहा है और अपने खिलाफ चल रहे दो पुराने मामलों—रुबैया सईद अपहरण (1989) और IAF कर्मियों की हत्या (1990)—में जिरह करना चाहता है। आइए, समझते हैं कि वह ऐसी दलीलें क्यों दे रहा है और इसके पीछे का संदर्भ क्या है।

मलिक की दलील का आधार

1."मैं आतंकवादी नहीं, नेता हूं"

मलिक ने कहा कि वह एक राजनीतिक नेता है और उसका संगठन JKLF आतंकवादी गतिविधियों में शामिल नहीं रहा। उसने 1994 में एकतरफा संघर्ष विराम की घोषणा का हवाला दिया, जिसके बाद उसे 32 मामलों में जमानत मिली और कोई नया केस आगे नहीं बढ़ा। वह इसे अपने अहिंसक रुख का सबूत मानता है।

2."7 PM ने मुझसे बात की"

मलिक ने पी.वी. नरसिम्हा राव, एच.डी. देवेगौड़ा, इंद्र कुमार गुजराल, अटल बिहारी वाजपेयी, मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी (पहले कार्यकाल) का नाम लिया। उसने दावा किया कि इन नेताओं ने उसके संघर्ष विराम का सम्मान किया और उससे संवाद किया।

3.CBI के आरोपों का ऐसे दिया ज़बाब

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने मलिक को "खतरनाक आतंकवादी" बताया, जो हाफिज सईद के साथ मंच साझा कर चुका है। जिसपर मलिक ने कहा कि इन बयानों ने उसके खिलाफ "सार्वजनिक राय" बना दी, जो गलत है। वह खुद को सुरक्षा खतरा बताए जाने का खंडन कर रहा है।

मलिक ऐसा क्यों कह रहा है?

यासीन मलिक सुप्रीम कोर्ट में यह दावा कर रहा है कि वह आतंकवादी नहीं, बल्कि एक राजनीतिक नेता है, और सात प्रधानमंत्रियों से उसकी बातचीत हुई है। उसका मकसद जम्मू कोर्ट में भौतिक पेशी हासिल करना है, ताकि वह गवाहों से आमने-सामने जिरह कर सके। CBI इसे सुरक्षा कारणों से रोक रही है, इसलिए मलिक "नेता" वाली छवि बनाकर नैतिक आधार मजबूत करना चाहता है। वह 1994 के संघर्ष विराम का हवाला देकर कहता है कि उसने हिंसा छोड़ दी थी, और पुराने मामले अब प्रासंगिक नहीं। सात PM से बातचीत का जिक्र करके वह अपनी सियासी वैधता दिखाना चाहता है, साथ ही CBI के "खतरनाक आतंकवादी" तर्क को कमजोर करने के लिए अपनी अहिंसक छवि पर जोर दे रहा है। यह उसकी कानूनी रणनीति का हिस्सा है, जिससे वह ट्रायल में फायदा उठा सके।

कोर्ट क्या कह रहा?

सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि वह मलिक के आतंकवादी होने या न होने पर फैसला नहीं कर रहा; उसका फोकस सिर्फ यह तय करना है कि उसे डिजिटल जिरह की इजाजत मिले या नहीं। जस्टिस अभय ओका और उज्जल भुइयां की बेंच ने जम्मू पेशी खारिज कर तिहाड़ से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग का आदेश दिया। दूसरी तरफ, CBI का तर्क है कि मलिक का जम्मू जाना सुरक्षा के लिए खतरा है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने उसके हाफिज सईद से जुड़ाव और 1989-1990 के आतंकी मामलों का जिक्र किया। CBI चाहती है कि ट्रायल जम्मू से दिल्ली शिफ्ट हो, ताकि सुरक्षा और सुविधा बनी रहे।

क्या है मालिक का ट्रैक रिकॉर्ड?

मलिक JKLF का संस्थापक है, जो कश्मीर की आजादी के लिए बना था। उसने 1989 में रुबैया सईद का अपहरण और 1990 में चार IAF कर्मियों की हत्या में भूमिका निभाई। 2019 में JKLF पर बैन लगा, और 2022 में टेरर फंडिंग केस में उसे उम्रकैद हुई, जहां उसने आतंकी गतिविधियों में शामिल होने की बात कबूल की। अभी CBI दो पुराने मामलों को जम्मू से दिल्ली ट्रांसफर करना चाहती है, और मलिक तिहाड़ से इनमें जिरह करना चाहता है। सुप्रीम कोर्ट में यह बहस चल रही है, और अगली सुनवाई से स्थिति साफ होगी।

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