वक्फ बिल कानून बन गया तो क्या होगा? 5 पॉइंट में समझ लीजिए पूरा माजरा
2 अप्रैल 2025 की रात लोकसभा में 12 घंटे की तीखी बहस के बाद वक्फ (संशोधन) विधेयक 2025 पास हो गया। 288 सांसदों ने हां कहा, 232 ने ना। अब यह बिल राज्यसभा की कसौटी पर है, और वहां से हरी झंडी मिलते ही कानून बन जाएगा। सत्ता पक्ष इसे गरीब मुसलमानों और महिलाओं के लिए क्रांतिकारी बता रहा है, तो विपक्ष इसे मुस्लिम विरोधी और संविधान की आत्मा पर हमला करार दे रहा है। बीजेपी का कहना है कि वक्फ बोर्ड की मनमानी पर लगाम लगेगी, वहीं ओवैसी जैसे नेता इसे धार्मिक आजादी छीनने की साजिश बता रहे हैं। तो आखिर इस बिल से देश में क्या बदल जाएगा? चलिए, इसकी परतें खोलते हैं।
वक्फ बोर्ड की ताकत पर चलेगी कैंची
सबसे बड़ा बदलाव वक्फ बोर्ड की उस ताकत का खात्मा है, जो उसे सेक्शन 40 से मिली थी। पहले बोर्ड किसी भी जमीन पर शंका के आधार पर अपना हक जमा दिया करता था। चाहे गांव हो, मंदिर हो, या इंडिया का कोई भी कोना, बोर्ड दावा ठोक देता था। केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने इसे "तानाशाही" करार देते हुए बताया कि अब यह अधिकार छीन लिया गया है।
अब जिला कलेक्टर तय करेगा कि कोई संपत्ति वक्फ की है या नहीं। अगर कोई फैसला पसंद न आए, तो 90 दिनों में हाई कोर्ट में अपील हो सकेगी। यानी बोर्ड की मनमानी पर ब्रेक और सरकार की पकड़ मजबूत। विपक्ष चिल्ला रहा है कि इससे वक्फ बोर्ड एक बेकार कठपुतली बन जाएगा।
गैर-मुस्लिमों का बोर्ड में दखल
इस बिल का एक और तड़का है—वक्फ बोर्ड में गैर-मुस्लिमों की एंट्री। केंद्रीय बोर्ड में 3 से 4 और राज्य बोर्डों में भी गैर-मुस्लिम सदस्य होंगे। गृह मंत्री अमित शाह ने सफाई दी कि ये लोग नमाज या कुरान की आयतों में हाथ नहीं डालेंगे, बस दान और संपत्ति के प्रबंधन को पारदर्शी बनाएंगे। बीजेपी इसे समावेशिता का कदम बता रही है, लेकिन विपक्ष इसे धार्मिक मामलों में दखल बता कर आग बबूला है। ओवैसी ने पूछा, "क्या हिंदू मंदिरों में मुस्लिम ट्रस्टी रखेंगे?" यह सवाल हवा में तैर रहा है।
महिलाओं और आदिवासियों को मिलेगा हक
बिल में एक नई बात यह है कि अब कोई अपनी संपत्ति वक्फ को देगा, तो पहले उसकी बेटियों, बहनों, विधवाओं या तलाकशुदा महिलाओं को उनका हिस्सा देना होगा। मिसाल के तौर पर, अगर कोई अपनी जमीन वक्फ करना चाहता है और उसकी विधवा बहन या बेटी है, तो पहले उन्हें उनका हिस्सा देना पड़ेगा, वरना वक्फ मान्य नहीं होगा।
सत्ता पक्ष इसे महिलाओं के सशक्तिकरण का हथियार बता रहा है। दूसरी तरफ, आदिवासियों की जमीन को वक्फ से छूने की मनाही होगी। संविधान की 5वीं-6ठी अनुसूची वाली जमीनें अब सुरक्षित रहेंगी, ताकि उनकी संस्कृति और आजीविका बची रहे।
खत्म हो जाएगा वक्फ़ बाय यूज़र
पहले वक्फ़ के कानून में "वक्फ बाय यूजर" का नियम हुआ करता था यानी अगर कोई जगह लंबे वक्त से मुस्लिम समुदाय इस्तेमाल कर रहा हो, तो वह वक्फ की हो जाती थी, बिना कागज के। जो अब खत्म हो जायेगा। सिर्फ लिखित दस्तावेज या वसीयत से ही संपत्ति वक्फ होगी। साथ ही, ASI की संरक्षित इमारतों जैसे ताजमहल या लाल किला—पर वक्फ का दावा खारिज होगा, जब तक बोर्ड ठोस सबूत न दे। बीजेपी इसे ऐतिहासिक धरोहरों की जीत बता रही है, लेकिन विपक्ष को पुरानी मस्जिदों की चिंता सता रही है।
वक्फ़ में दान के लिए 5 साल की मुस्लिम नागरिकता अनिवार्य
अब कोई अपनी संपत्ति वक्फ को देगा, तो उसे कम से कम 5 साल से मुस्लिम होना होगा। यह नियम पहले था, 2013 में हटा, और अब फिर लौटा। साथ ही, जिला कलेक्टर को नया "बॉस" बनाया गया है। पहले बोर्ड खुद जांच करता था, अब कलेक्टर हर दावे की छानबीन करेगा। शाह ने कहा कि इससे मनमानी खत्म होगी, लेकिन विपक्ष इसे सरकारी हस्तक्षेप का हथियार मान रहा है।
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