वक्फ बिल को लेकर विपक्ष के सामने बढ़ी चुनौतियां, आजमा सकता है ये 3 ऑप्शन
लंबे समय से पेंडिंग चल रहे वक्फ संशोधन बिल ने संसद में काफी चर्चा बटोरी और आखिरकार इसे दोनों सदनों से पारित कर दिया गया। इस बिल के पारित होने के बाद अब विपक्ष और मुस्लिम संगठनों ने इसे लेकर विरोध जताना शुरू कर दिया है। ऐसे में विपक्ष अब इस बिल को लागू होने से रोकने के लिए हरसंभव प्रयास करने में जुट गया है। एक्सपर्ट्स के अनुसार विपक्ष के पास अब इस बिल को रोकने के लिए तीन प्रमुख विकल्प हैं - अदालत का सहारा लेना, सड़क पर आंदोलन करना और राजनीतिक पार्टियों पर अलग-अलग तरह से दबाव बनाना। यहां सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या विपक्ष इन रास्तों से या किसी भी अन्य तरह से इस बिल को रोकने में सफल हो पाएगा?
वक्फ संशोधन बिल के खिलाफ कोर्ट में अपील करना
कांग्रेस और एआईएमआईएम के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने सुप्रीम कोर्ट में वक्फ बिल के खिलाफ याचिका दायर की है। उनका कहना है कि यह बिल संविधान के मूल सिद्धांतों और नागरिक अधिकारों के खिलाफ है। यह बिल लोकसभा में 288 वोटों से पास हुआ, जबकि राज्यसभा में भी इसे बहुमत मिला। अब विपक्ष का सवाल यह है कि क्या सुप्रीम कोर्ट इस बिल को रोका जा सकता है, जैसा कि पहले कई अन्य मामलों में कोर्ट ने विपक्ष की याचिकाओं को खारिज किया है।
सड़क पर आंदोलन के लिए उतरे विपक्ष
विपक्ष और मुस्लिम संगठनों ने इस बिल के खिलाफ विरोध प्रदर्शन भी शुरू कर दिए हैं। लुधियाना और कोलकाता में जगह-जगह पुतला दहन और नारेबाजी की गई। कोलकाता से अहमदाबाद तक और केरल से दिल्ली तक हर जगह विधेयक के विरोध में प्रदर्शन शुरू हो गए हैं। हालांकि, यूपी जैसे राज्यों में कोई बड़ा विरोध प्रदर्शन नहीं हुआ, लेकिन इन प्रदर्शनों के बावजूद, क्या सड़क से विरोध सरकार पर दबाव डालने में सक्षम होगा? यह सवाल अब भी अनसुलझा है।
राजनीतिक पार्टियों पर अलग-अलग तरह से दबाव बनाना
विपक्ष का तीसरा दांव नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू की पार्टी पर है, क्योंकि उनका मानना है कि बीजेपी इस बिल को अकेले पास नहीं कर सकती थी। अगर जेडीयू और अन्य गठबंधन सहयोगियों ने समर्थन नहीं दिया होता, तो बिल पास होना मुश्किल था। अब विपक्ष का प्रयास है कि जेडीयू के मुस्लिम नेताओं को दबाव में लाकर बिल को वापस लिया जाए। कुछ मुस्लिम नेताओं ने पार्टी छोड़ दी है, और अब सवाल यह है कि क्या नीतीश कुमार इस दबाव को सह पाएंगे या नहीं।
पसमांदा मुस्लिमों पर नजर टिकाए हैं नीतिश कुमार
नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू ने कहा है कि जो नेता पार्टी छोड़कर गए हैं, उन्हें कोई खास पहचान नहीं है और वे पसमांदा मुस्लिमों का समर्थन रखने का दावा कर रहे हैं। इसके अलावा, नीतीश कुमार के लिए मुस्लिम वोटों का बंटवारा कोई नई बात नहीं है। 2020 के विधानसभा चुनावों में भी उनकी पार्टी ने मुस्लिम वोटों का अच्छा हिस्सा हासिल किया था, और उन्हें उम्मीद है कि पसमांदा मुस्लिम समुदाय का समर्थन उन्हें मिलेगा।
क्या नीतीश कुमार की रणनीति सही है?
बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार माहिर खिलाड़ी माने जाते हैं, और उनका हर कदम सटीक गणना के साथ होता है। बिहार में मुस्लिम आबादी का बड़ा हिस्सा पसमांदा मुसलमानों का है, और उनकी संख्या 73% है। नीतीश को उम्मीद है कि पसमांदा मुस्लिम समाज उनके साथ रहेगा, जबकि विपक्ष को लगता है कि मुस्लिम वोटों की नाराजगी उनके लिए खतरनाक हो सकती है। अब जबकि विपक्ष और मुस्लिम संगठनों के लिए वक्फ बिल एक बड़ा मुद्दा बन चुका है, और अब यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या वे अदालत, आंदोलन या राजनीतिक दबाव के जरिए इस बिल को रोकने में सफल हो पाते हैं, या सरकार इसे बिना किसी बाधा के लागू कर देती है।
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