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1965 की जंग के बाद शास्त्री जी बोले- ‘जय जवान जय किसान’ पर फिल्म बनाओ, मनोज कुमार ने बनाई ‘उपकार’, ऐसे बने ‘भारत कुमार’

'मनोज कुमार की 'उपकार' फिल्म का वो मजेदार किस्सा, जब शास्त्री जी ने कहा 'जय जवान जय किसान' पर मूवी बनाओ। जानो कैसे बने वो 'भारत कुमार' और देशभक्ति के सितारे।'
09:26 PM Apr 04, 2025 IST | Girijansh Gopalan

लेजेंडरी एक्टर मनोज कुमार अब हमारे बीच नहीं रहे। मुंबई में उनका निधन हो गया और बॉलीवुड ने एक ऐसा सितारा खो दिया, जिसने देशभक्ति को पर्दे पर जिंदा कर दिखाया। चार दशकों तक फिल्मी दुनिया में धमाल मचाने वाले मनोज कुमार की फिल्में आज भी लोगों के दिलों में बस्ती हैं। लेकिन उनकी असली पहचान बनी देशभक्ति वाली मूवीज से। एक्टिंग के साथ-साथ उन्होंने डायरेक्शन में भी हाथ आजमाया और उनकी पहली ही फिल्म 'उपकार' ने ऐसा धमाका किया कि वो रातों-रात 'भारत कुमार' बन गए। आज हम आपको उस फिल्म के पीछे का मजेदार किस्सा और मनोज कुमार की जिंदगी की कुछ अनसुनी बातें बताने जा रहे हैं। तो चलिए, शुरू करते हैं।

शास्त्री जी का आइडिया, मनोज का जादू

1965 में भारत-पाकिस्तान की जंग छिड़ी थी। उस वक्त देश का माहौल गर्म था और हर तरफ जज्बा था। इसी बीच मनोज कुमार की मुलाकात हुई तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री से। मनोज का नेताओं से अच्छा तालमेल था और शास्त्री जी को भी वो भा गए। बातचीत में शास्त्री जी ने अपना फेमस नारा 'जय जवान जय किसान' छेड़ा और मनोज से कहा, "क्यों न इस पर एक फिल्म बनाओ?" बस, शास्त्री जी की ये बात मनोज के दिमाग में घर कर गई। दो साल बाद, 1967 में 'उपकार' पर्दे पर आई। फिल्म में देशभक्ति का ऐसा रंग चढ़ा कि लोग देखते ही रह गए। जवान और किसान की कहानी को मनोज ने इतने शानदार तरीके से पेश किया कि फिल्म ने न सिर्फ क्रिटिक्स की वाहवाही लूटी, बल्कि बॉक्स ऑफिस पर भी तहलका मचा दिया। उस साल की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म बनी
'उपकार' और ऑल टाइम ब्लॉकबस्टर का तमगा भी इसे मिला।

फिल्म का गाना 'मेरे देश की धरती' तो ऐसा हिट हुआ कि आज भी स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर बजता है। 60 के दशक में ये छठा सबसे ज्यादा बिकने वाला हिंदी फिल्म एल्बम बना। फिल्म में मनोज कुमार ने एक्टिंग के साथ-साथ डायरेक्शन भी किया था। ये उनकी पहली डायरेक्टोरियल फिल्म थी और इसमें प्रेम चोपड़ा, आशा पारेख, कामिनी कौशल और प्राण जैसे सितारे भी थे। 'उपकार' को 7 फिल्मफेयर अवॉर्ड्स मिले और मनोज को नेशनल फिल्म अवॉर्ड भी हासिल हुआ। इतना ही नहीं, फिल्म इतनी पॉपुलर हुई कि तेलुगू में इसका रीमेक बना, नाम रखा गया 'Padipantalu'।

हरिकृष्ण से मनोज बनने की कहानी

अब जरा मनोज कुमार की जिंदगी में पीछे चलते हैं। उनका असली नाम था हरिकृष्ण गिरी गोस्वामी। लेकिन ये नाम बदलकर 'मनोज कुमार' कैसे बना, इसका किस्सा भी कम मजेदार नहीं है। बचपन से ही उन्हें फिल्मों का कीड़ा था। दिल्ली के हिंदू कॉलेज से BA की डिग्री लेने के बाद वो मुंबई पहुंचे और बॉलीवुड में किस्मत आजमाने लगे।
मनोज को उस जमाने के बड़े सितारे दिलीप कुमार, अशोक कुमार और कामिनी कौशल बहुत पसंद थे। खास तौर पर दिलीप कुमार की 1949 में आई फिल्म 'शबनम' ने उन्हें ऐसा प्रभावित किया कि फिल्म में दिलीप के किरदार का नाम 'मनोज' उन्हें भा गया। बस, फिर क्या था? हरिकृष्ण ने अपना नाम बदलकर मनोज कुमार कर लिया और यही नाम उनकी पहचान बन गया।

देशभक्ति ने दी नई पहचान

'उपकार' के बाद मनोज कुमार रुकने वाले कहां थे। उन्होंने एक के बाद एक देशभक्ति से भरी फिल्में बनाईं। 'पूरब और पश्चिम', 'क्रांति', 'रोटी कपड़ा और मकान' जैसी मूवीज में उनका रील नाम 'भारत' था। इन फिल्मों में वो देश के लिए कुछ कर गुजरने वाले किरदार में नजर आए। हर फिल्म में उनका जज्बा देखने लायक था और दर्शकों ने भी उन्हें भरपूर प्यार दिया। इन मूवीज ने बॉक्स ऑफिस पर खूब कमाई की और मनोज का नाम इतना फेमस हो गया कि लोग उन्हें 'भारत कुमार' बुलाने लगे। एक पुराने इंटरव्यू में मनोज ने इस नाम के पीछे की बात बताई थी। वो बोले, "अक्सर फिल्मों में जो किरदार अच्छा होता है, उसका नाम लोगों के जेहन में रह जाता है। मैंने सोचा कि हमारा देश गांवों में बसता है, किसानों का देश है। तो अपने किरदार का नाम 'भारत' रखा। हमारे देश की जनता इतनी प्यारी है कि अगर उन्हें कुछ सच्चा और अच्छा लगता है, तो वो इतना प्यार और सम्मान देती है कि दुनिया में कोई नहीं दे सकता। मैं तो बस एक साधारण सा लड़का था, आप लोगों ने मुझे 'भारत' बना दिया।"

फिल्मों से परे मनोज की जिंदगी

मनोज कुमार सिर्फ एक्टर या डायरेक्टर ही नहीं थे, वो एक सोच थे। उनकी फिल्मों में देश का दर्द, किसानों की हालत और जवानों की कुर्बानी साफ झलकती थी। 'उपकार' में जहां उन्होंने जवान और किसान की दोहरी जिंदगी दिखाई, वहीं 'पूरब और पश्चिम' में भारतीय संस्कृति को पश्चिमी सभ्यता के सामने खड़ा किया। 'रोटी कपड़ा और मकान' में गरीबी और समाज की सच्चाई को उजागर किया। हर फिल्म में एक मैसेज था, जो सीधे दिल तक जाता था। उनकी फिल्मों का म्यूजिक भी कमाल का था। 'मेरे देश की धरती' हो या 'ये देश है वीर जवानों का', हर गाना ऐसा था कि सुनते ही जोश भर जाता था। मनोज की खासियत ये थी कि वो सादगी से बड़ी बात कह जाते थे। पर्दे पर वो जितने सशक्त दिखते थे, असल जिंदगी में उतने ही साधारण थे।

मनोज कुमार का निधन बॉलीवुड के लिए बड़ी क्षति

मनोज कुमार का निधन बॉलीवुड के लिए बड़ी क्षति है। वो एक ऐसे एक्टर थे, जिन्होंने फिल्मों को सिर्फ मनोरंजन नहीं बनाया, बल्कि उसे समाज को जोड़ने का जरिया बनाया। उनकी फिल्में आज भी उतनी ही रिलेवेंट हैं, जितनी उस जमाने में थीं। 'उपकार' से शुरू हुआ उनका सफर 'भारत कुमार' बनने तक पहुंचा और ये नाम उनके साथ हमेशा के लिए जुड़ गया। आज जब वो हमारे बीच नहीं हैं, तो उनकी फिल्में और गाने हमें याद दिलाते हैं कि देशभक्ति क्या होती है। मनोज कुमार ने साबित किया कि फिल्में सिर्फ कहानी नहीं होतीं, वो एक एहसास होती हैं। तो अगली बार जब 'मेरे देश की धरती' बजे, तो थोड़ा ठहर कर मनोज को याद कर लीजिएगा। वो 'भारत' जो पर्दे पर जिया और हमारे दिलों में बस गया।

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