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मनमोहन सिंह का 1991 का बजट: जब लाइसेंस राज टूटा और भारतीय अर्थव्यवस्था को मिली नई उड़ान

1991 का बजट, जब डॉ. मनमोहन सिंह ने भारत की अर्थव्यवस्था को संकट से उबारते हुए लाइसेंस राज खत्म किया और प्राइवेटाइजेशन, ग्लोबलाइजेशन का रास्ता खोला।
12:38 PM Dec 27, 2024 IST | Vibhav Shukla

Manmohan Singh 1991 Budget: भारत के पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह का हाल ही में निधन हो गया। उनका योगदान भारतीय राजनीति और अर्थव्यवस्था में हमेशा याद रहेगा, खासकर 1991 के आर्थिक संकट के दौरान उनके द्वारा किए गए ऐतिहासिक फैसले। वो समय था जब देश आर्थिक संकट से जूझ रहा था, और डॉ. मनमोहन सिंह ने वित्त मंत्री के रूप में वो कदम उठाए, जिनकी वजह से भारतीय अर्थव्यवस्था की तस्वीर बदल गई। अगर आज भारत को एक मजबूत और आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था माना जाता है, तो इसमें डॉ. मनमोहन सिंह के 1991 के फैसलों का बड़ा हाथ है।

जब भारत का रुपया गिर रहा था, और संकट गहरा था

90 के दशक के शुरुआती सालों में भारतीय अर्थव्यवस्था गंभीर संकट से जूझ रही थी। देश का विदेशी मुद्रा भंडार खत्म हो गया था, महंगाई दर बेलगाम हो चुकी थी और देश दिवालिया होने के कगार पर था। इन हालातों में, 1991 में भारत का रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 18% तक गिर चुका था। ये स्थिति इतनी खराब थी कि भारत के पास केवल 6 अरब डॉलर का फॉरेक्स रिजर्व बचा था, जो मुश्किल से दो हफ्ते के लिए पर्याप्त था। इसके अलावा, खाड़ी युद्ध के कारण कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू रही थीं। देश के सामने ये एक बहुत बड़ा आर्थिक संकट था।

1991 का ऐतिहासिक बजट: लाइसेंस राज का खात्मा

ऐसे वक्त में डॉ. मनमोहन सिंह ने अपनी सूझबूझ से देश की किस्मत पलट दी। 24 जुलाई 1991 को उन्होंने अपने पहले बजट में कुछ बड़े ऐलान किए, जिन्होंने भारत की अर्थव्यवस्था को पूरी तरह से बदल दिया। इस बजट में सबसे बड़ा कदम था लाइसेंस राज का खात्मा। इसका मतलब ये था कि अब कंपनियों को बिना किसी सरकारी अनुमति के व्यापार करने की आज़ादी मिल गई। इससे निजी क्षेत्र को बढ़ावा मिला और विदेशों से निवेश का रास्ता खोला।

इसके अलावा, उन्होंने आयात शुल्क को 300% से घटाकर 50% कर दिया, सीमा शुल्क को 220% से घटाकर 150% किया और आयात के लिए लाइसेंस प्रक्रिया को आसान बना दिया। ये कदम भारत को वैश्विक अर्थव्यवस्था से जोड़ने के लिए जरूरी थे। डॉ. मनमोहन सिंह ने अपने बजट में प्राइवेटाइजेशन, ग्लोबलाइजेशन और उदारीकरण की बात की, जो भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए मील का पत्थर साबित हुआ।

विदेशी निवेश का रास्ता खोला

डॉ. मनमोहन सिंह के फैसलों ने भारत को विदेशी निवेश के लिए एक आकर्षक गंतव्य बना दिया। इसके बाद भारत में विदेशी कंपनियों की हिस्सेदारी बढ़ी और भारतीय बाजार में प्रतिस्पर्धा का माहौल बना। इससे भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिली और भारत के बाजारों में अंतरराष्ट्रीय निवेशकों का विश्वास बढ़ा।

इसके अलावा, डॉ. मनमोहन सिंह ने कॉर्पोरेट टैक्स की दर में बढ़ोतरी की और TDS (Tax Deducted at Source) की शुरुआत की। साथ ही, म्यूचुअल फंड्स में प्राइवेट सेक्टर की भागीदारी को भी अनुमति दी गई। इन फैसलों से वित्तीय क्षेत्र में सुधार हुआ और भारत के विदेशी मुद्रा भंडार को भी संजीवनी मिली।

गीता गोपीनाथ ने दी श्रद्धांजलि

इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड (IMF) की डिप्टी मैनेजिंग डायरेक्टर गीता गोपीनाथ ने भी डॉ. मनमोहन सिंह के 1991 के बजट की सराहना की। उन्होंने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा कि "डॉ. मनमोहन सिंह के 1991 के बजट ने भारत की अर्थव्यवस्था को मुक्त किया, जिससे करोड़ों भारतीयों की आर्थिक संभावनाओं में काफी सुधार हुआ। उनके दूरदर्शी सुधारों ने हम जैसे युवा अर्थशास्त्रियों को प्रेरित किया।"

मनरेगा और RTI: ग्रामीण भारत में सुधार

डॉ. मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री बनने के बाद उनकी सरकार ने कई ऐतिहासिक कदम उठाए। इनमें से एक था 2005 में मनरेगा (महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी अधिनियम) का शुरू होना। इस योजना ने प्रत्येक ग्रामीण परिवार को 100 दिन का वेतनभोगी रोजगार सुनिश्चित किया, जिससे ग्रामीणों की आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ।

इसके अलावा, 2005 में ही सूचना का अधिकार (RTI) कानून लागू किया गया, जिससे सरकार को पारदर्शी बनाने में मदद मिली। इस कानून के तहत आम नागरिकों को सरकारी कार्यों से जुड़ी जानकारी प्राप्त करने का अधिकार मिला।

आधार कार्ड की शुरुआत: एक नई पहचान

2009 में डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में आधार कार्ड योजना की शुरुआत की गई। इसका उद्देश्य था हर भारतीय नागरिक को एक यूनिक पहचान दिलाना, ताकि सरकारी योजनाओं और सेवाओं तक उनकी पहुंच आसान हो सके। आज, आधार कार्ड देश के हर नागरिक के लिए एक जरूरी दस्तावेज बन चुका है, जिससे सरकारी सेवाओं का लाभ लेना काफी आसान हो गया है।

कृषि संकट का समाधान और खाद्य सुरक्षा

डॉ. मनमोहन सिंह के कार्यकाल की एक और बड़ी उपलब्धि थी कृषि संकट को दूर करने के लिए 60,000 करोड़ रुपये की ऋण माफी योजना लागू करना। इस योजना से किसानों को राहत मिली और कृषि क्षेत्र में सुधार हुआ। इसके अलावा, 2013 में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA) लागू किया गया, जिसने गरीबों को सस्ते दामों पर अनाज उपलब्ध कराने की व्यवस्था की।

डॉ. मनमोहन सिंह को हमेशा एक दूरदर्शी और संवेदनशील नेता के रूप में याद किया जाएगा। उनका विश्वास था कि आर्थिक सुधारों से ही देश का विकास हो सकता है और इसके जरिए लाखों लोगों का जीवन बदल सकता है। उनके द्वारा किए गए सुधारों ने न केवल भारतीय अर्थव्यवस्था को संकट से उबारा, बल्कि उसे एक नई दिशा भी दी।

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