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कर्नाटक की पहाड़ियों में दिखी रंगीन ‘बत्तख’ की नई नस्ल, वैज्ञानिक भी रह गए दंग

बेलगावी की पहाड़ियों में दिखी एक नई बत्तख, जो दिखती है तीतर जैसी और दौड़ती है बिजली की रफ्तार से। जानिए इस रंगीन, शर्मीली और उड़ न पाने वाली अनोखी बत्तख की पूरी कहानी, जिसे देखकर साइंटिस्ट भी चौंक गए।
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अब तक आपने बत्तखों को ज्यादातर सफेद रंग की, थोड़ी सी भारी-भरकम, और पानी में तैरती हुई देखा होगा। लेकिन कर्नाटक की पहाड़ियों में हाल ही में जो बत्तख मिली है, उसने न सिर्फ वैज्ञानिकों की नींद उड़ा दी है, बल्कि सोशल मीडिया पर भी चर्चाओं का नया विषय बना दिया है। बेलगावी जिले के रामदुर्ग के पास की पहाड़ियों में एक अनोखी बत्तख देखी गई है, जो बत्तख जैसी दिखती तो है, लेकिन असल में तीतर परिवार से ताल्लुक रखती है। इसे ‘पेंटेड स्पैरोफाउल’ यानी कि Galloperdix lunulata नाम दिया गया है। इसे खोजा है बेलगावी के रहने वाले शशिकांत कम्बन्नवर ने, जो पेशे से केपीटीसीएल में अधिकारी हैं, लेकिन दिल से नेचर लवर और रिसर्चर भी हैं।

कैसे मिली ये अनोखी बत्तख?

शशिकांत साहब असल में पहाड़ियों में मकड़ियों पर रिसर्च कर रहे थे। एक दिन कैमरा उठाए झाड़ियों के पीछे घूम रहे थे, तभी अचानक उन्हें कुछ दौड़ता हुआ नज़र आया। पहले लगा कोई तीतर होगा, लेकिन रंग-बिरंगे पंखों और पूंछ को देखकर हैरान रह गए। जब पास जाकर ध्यान से देखा, तो मालूम पड़ा कि ये कोई आम तीतर नहीं है। न ही कोई साधारण बत्तख है। यह है पेंटेड स्पैरोफाउल, जो बेहद दुर्लभ प्रजाति मानी जाती है।

क्या है इस बत्तख की खासियत?

इस बत्तख की सबसे पहली खासियत है – इसका रंग। ये सफेद या हल्के रंग की नहीं है, बल्कि इसके शरीर पर गहरे रंग हैं। नर और मादा के रंग में भी बड़ा फर्क है।

नर बत्तख की पहचान:

पूंछ और पंख काले रंग के होते हैं

किनारों पर सफेद धब्बे होते हैं

गर्दन और सिर पर हल्की हरी आभा दिखाई देती है

पैरों में चार दांत जैसे कांटे होते हैं

मादा बत्तख:

रंग फीका होता है

शरीर पर सफेद धब्बे नहीं होते

चोंच और पैर गहरे भूरे रंग के होते हैं

पैरों पर एक या दो कांटे जैसे दांत होते हैं

इस बत्तख की पूंछ बाकी बत्तखों से अलग होती है, जो देखने में इसे और भी खास बनाती है। हालांकि इसे उड़ने में दिक्कत होती है, लेकिन दौड़ने में यह कमाल की है। यानी अगर आप इसे पकड़ने की सोच रहे हैं, तो पहले रनिंग शूज पहन लें!

बत्तख नहीं, तीतर है ये जनाब!

अब सबसे बड़ा सवाल – ये बत्तख है या तीतर? असल में यह एक ऐसी प्रजाति है जो दोनों का मिक्सचर है। वैज्ञानिक रूप से इसे तीतर के परिवार में रखा गया है, लेकिन इसकी बॉडी स्ट्रक्चर और आदतें कई मायनों में बत्तखों से मिलती हैं। शायद इसी वजह से इसे “स्पैरोफाउल” यानी चिड़ी जैसी बत्तख कहा गया है। ये ज्यादातर समय जमीन पर ही रहती है और झाड़ियों में छिपी रहती है। पानी से इसका कुछ खास लेना-देना नहीं है।

कहां मिलती है ये बत्तख?

यह खास प्रजाति बेलगावी जिले के रामदुर्ग इलाके में मिली है। यहां की जलवायु, पहाड़ी क्षेत्र, और घनी झाड़ियां इसके लिए सबसे उपयुक्त वातावरण बनाते हैं। यह इलाका नदियों, झीलों और छोटी पहाड़ियों से घिरा हुआ है। यही वजह है कि यहां पर बत्तख पालन एक लाभदायक व्यवसाय भी है। पानी और ज़मीन – दोनों की सुविधा के कारण इस इलाके में बत्तखें आसानी से पाली जा सकती हैं।

बत्तख पालन के लिए अनुकूल जगह

बेलगावी जैसे इलाके में बत्तख पालन बहुत तेजी से उभर रहा है। यहां की जलवायु, पानी की उपलब्धता और प्राकृतिक संसाधन इस काम को और भी सरल बना देते हैं।
बत्तखें नदियों, तालाबों, झीलों, महासागरों और दलदलों के पास आसानी से पनपती हैं। लेकिन जो खास बात है वो ये कि ये बत्तख पानी में तैरने से ज्यादा ज़मीन पर दौड़ने में भरोसा करती है।

वैज्ञानिकों की क्या है राय?

शशिकांत की इस खोज के बाद वैज्ञानिकों ने भी इस पर गहरी रुचि दिखाई है। कई लोगों ने कहा कि इस प्रजाति पर अब विस्तृत अध्ययन किया जाना चाहिए। ऐसा इसलिए क्योंकि यह न सिर्फ जैव विविधता में इजाफा करती है, बल्कि इससे पर्यावरणीय शोध को भी नई दिशा मिलती है।

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