Durga Ashtami 2025: 4 या 5 अप्रैल कब है अष्टमी? जानिए तिथि, कन्या पूजन विधि व मुहूर्त
Durga Ashtami 2025: देवी दुर्गा को समर्पित नौ दिवसीय चैत्र नवरात्रि रविवार 30 मार्च से शुरू हो गया है और रविवार 7 अप्रैल को समाप्त होगा। नवरात्रि का प्रत्येक दिन देवी के विभिन्न रूपों की पूजा करने के लिए समर्पित है, जिसमें विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग रीति-रिवाज हैं। अष्टमी तिथि, जिसे दुर्गा अष्टमी (Durga Ashtami 2025) के रूप में जाना जाता है, इस अवधि के दौरान विशेष महत्व रखती है। इस वर्ष अष्टमी तिथि को लेकर लोगों में थोड़ी भ्रम की स्थिति बनी हुई है। ऐसे में ज्योतिषचार्यों की माने तो चैत्र नवरात्रि की अष्टमी शनिवार, 5 अप्रैल को मनाई जायेगी।
अष्टमी तिथि समय
नवरात्रि का आठवां दिन दुर्गा अष्टमी, देवी दुर्गा (Durga Ashtami 2025) की पूजा के लिए सबसे शुभ दिनों में से एक माना जाता है। भक्तों का मानना है कि इस दिन देवी ने राक्षस महिषासुर पर विजय प्राप्त की थी, जो बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। व्रत रखना, विशेष प्रार्थना करना और कन्या पूजन जैसे अनुष्ठान करना इस दिन का अभिन्न अंग है।
अष्टमी तिथि शुरू: 5 अप्रैल, 2025 को सुबह 04:43 बजे
अष्टमी तिथि समाप्त: 6 अप्रैल, 2025 को सुबह 02:56 बजे
कन्या पूजन व महत्त्व
कन्या पूजन, जिसे कुमारी पूजा (Kanya Pujan 2025) के रूप में भी जाना जाता है, एक अनुष्ठान है जिसमें छोटी लड़कियों, आमतौर पर 2 से 10 वर्ष की आयु के बीच, को देवी दुर्गा के नौ रूपों का प्रतीक, दिव्य स्त्री ऊर्जा के अवतार के रूप में पूजा जाता है। यह समारोह हिंदू संस्कृति में स्त्री शक्ति और पवित्रता के प्रति श्रद्धा को दर्शाता है। कन्या पूजन हिंदू धर्म में स्त्री शक्ति को दी जाने वाली पवित्रता और सम्मान पर जोर देता है। छोटी लड़कियों का सम्मान करके, भक्त पवित्रता, मासूमियत और दिव्यता के गुणों को आत्मसात करना चाहते हैं। यह अनुष्ठान बालिकाओं के पालन-पोषण और सुरक्षा के महत्व की याद दिलाता है और समाज में लैंगिक समानता और महिलाओं के प्रति सम्मान को बढ़ावा देता है।
कन्या पूजन की विधि
भक्त अष्टमी के दिन नौ छोटी लड़कियों (Kanya Pujan Vidhi) को अपने घर आमंत्रित करते हैं। आगमन पर, सम्मान और शुद्धि के प्रतीक के रूप में लड़कियों के पैर धोए जाते हैं। उनके माथे पर लाल सिंदूर का तिलक लगाया जाता है। लड़कियों को बैठाया जाता है और पारंपरिक भोजन परोसा जाता है, जिसमें आमतौर पर पूड़ी , काला चना और हलवा शामिल होता है। भोजन के बाद, लड़कियों को कपड़े, चूड़ियां या पैसे जैसे उपहार दिए जाते हैं। छोटी लड़कियों को देवी के रूप में स्वीकार करते हुए उनका सम्मान करने के लिए एक पारंपरिक आरती की जाती है।
कन्या पूजन का शुभ समय
अष्टमी तिथि की पूरी अवधि कन्या पूजन के लिए शुभ मानी जाती है, लेकिन सबसे अनुकूल समय ब्रह्म मुहूर्त है, जो सूर्योदय से लगभग डेढ़ घंटे पहले होता है। हालांकि, अगर यह समय संभव न हो तो अभिजीत मुहूर्त के दौरान भी अनुष्ठान करना शुभ माना जाता है। भौगोलिक स्थिति के आधार पर सटीक समय के लिए स्थानीय पंचांग या विद्वान पुजारियों से परामर्श करना उचित है।
सांस्कृतिक विविधताएं
उत्तरी भारत: यह अनुष्ठान मुख्य रूप से अष्टमी को मनाया जाता है, जिसमें भोज और सामुदायिक समारोह होते हैं।
पूर्वी भारत: पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में, कन्या पूजन संधि पूजा के दौरान किया जाता है, जो अष्टमी और नवमी के बीच संक्रमण को दर्शाता है।
दक्षिणी भारत: यहां नवरात्रि तो धूमधाम से मनाया जाता है, लेकिन कन्या पूजन उतना प्रमुख नहीं होता है, हालांकि कुछ लोगों द्वारा इसका पालन किया जाता है।
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